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बुधवार, 29 जुलाई 2015

कुछ शायरी की बात होजाए - प्रस्तावना---( ड़ा रंगनाथ मिश्र 'सत्य ')

                                                     कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित


                                   कुछ शायरी की बात होजाए ---
                                          ------ प्रस्तावना ------
                                           ( ड़ा रंगनाथ मिश्र 'सत्य ')
Drshyam Gupta's photo. ------------ जीवन और जगत को एक साथ जीने वाले महाकवि डा श्यामगुप्त हिन्दी के वरिष्ठ कवि व लेखक हैं | आपकी अब तक नौ साहित्यिक कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं — काव्यदूत, काव्य निर्झरिणी, काव्यमुक्तामृत ( सभी काव्य संग्रह )...सृष्टि –अगीत विधा पर आधारित वैज्ञानिक महाकाव्य....प्रेम काव्य – गीति विधा पर आधारित महाकाव्य ...शूर्पणखा – अगीत विधा खंड काव्य ...इन्द्रधनुष –स्त्री-पुरुष विमर्श पर उपन्यास...अगीत साहित्य दर्पण – अगीत विधा का आदि से अब तक इतिहास एवं छंद विधान तथा डा श्याम गुप्त व श्रीमती सुषमागुप्ता द्वारा रचित-–ब्रजभाषा में विभिन्न काव्य विधाओं की रचनाओं का संग्रह ‘ब्रज बांसुरी ‘ | ये सभी कृतियाँ लोकार्पित होकर सुधी पाठकों एवं बुद्धिजीवियों के मध्य प्रशंसित हो चुकी हैं| प्रस्तुत दसवीं कृति ‘कुछ शायरी की बात होजाए ‘ शीर्षक से विविध विधाओं- ग़ज़ल, नज़्म, रुबाई, कतए, शे’र आदि का संग्रह, देवनागरी लिपि हिन्दी में प्रकाशित होकर शीघ्र ही साहित्यानुरागियों के समक्ष प्रस्तुत होने जा रही है |
Drshyam Gupta's photo.

--------उर्दू शायरी के दो स्कूल प्रसिद्ध हैं– १.लखनऊ स्कूल की शायरी ...२.दिल्ली स्कूल की शायरी | हैदराबाद की उर्दू शायरी अलग है | उर्दू की स्वयं की कोई लिपि नहीं है, यह अरबी-फारसी लिपि में लिखी जाती है जो अंग्रेज़ी की तरह ही विदेशी लिपि है | राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिन्दी भाषा को मान्यता दी, जिसमें देवनागरी लिपि का प्रयोग होता है, साथ ही बोलचाल के उर्दू शब्द भी प्रयोग किये जाते हैं, जिस प्रकार अंग्रेज़ी शब्द हिन्दी लेखन में आत्मसात किये गए हैं|

---------- महाकवि डा श्यामगुप्त आगरा जनपद में जन्मे हैं, जो दिल्ली के निकट है | हम कह सकते हैं कि कविवर गुप्तजी की शायरी लखनऊ व दिल्ली दोनों स्कूलों से प्रभावित है | लखनऊ स्कूल की शायरी की छाप उनकी शायरी में विशेष रूप से देखने को मिलती है | इस स्कूल में सैकड़ों शायर जुड़े हुए हैं यथा -शायर आलीबासी, कृष्णबिहारी ‘नूर’, दिल लखनवी, खुमार बाराबंकवी, डा सागर आज़मी, आफताब लखनवी, साहिर लखनवी आदि | वर्तमान के शायर प्रो.मलिकजादा मंज़ूर अहमद, वशीर फारुखी, डा सुल्तान शाकिर हाशमी, मुनब्बर राना, के के सिंह मयंक आदि के नाम लिए जा सकते हैं| हिन्दी कवियों बलबीर सिंह ‘रंग’, दुष्यंत कुमार ,राम बहादुर सिंह भदौरिया आदि द्वारा भी भारी संख्या में हिन्दी गज़लें लिखी गयी हैं | आज भी गंगारत्न पाण्डे, नवीन शुक्ल ‘नवीन’, देवकी नंदन शांत, पार्थोसेन आदि सेकड़ों रचनाकार देवनागरी लिपि में गज़लें, शेर आदि लिख रहे हैं|
------- डा श्याम गुप्त ने ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ शायरी संग्रह को छह भागों में विभक्त किया है | जो इस प्रकार हैं---१,गज़लें...२.नज्में...३.आज़ाद नज्में...४. रुबाइयां...५. कतए..६.आज़ाद शे’र ..|
------- जैसी कि परम्परा है कि कवि सदा गणेश-वन्दना या सरस्वती-वंदना से अपने काव्य-संग्रह की शुरूआत करता है| डा श्यामगुप्त के इससे पहले जितने भी संग्रह व काव्य प्रकाशित हुए है उनमें इस बात का ध्यान रखा गया है| प्रस्तुत शायरी संग्रह में महाकवि ने अपनी पहली ग़ज़ल द्वारा ‘परमसत्ता’ को नमन किया है, देखें ....
बड़े बड़ों के ढीले सुर-तेवर होजाते हैं |
क्या तिनका क्या गर्वोन्नत गिरि नत होजाते हैं |
जिसके आगे बड़े बड़ों की अकड नहीं चल पाए,
श्याम, परमसत्ता के आगे शीश झुकाते हैं |
---------- संग्रह की सभी गज़लें सामाजिक सरोकारों से जुडी हुईं हैं | इन ग़ज़लों में पाठकों को वह सभी कुछ मिलेगा जो उन्हें एक सच्चे लेखक से उम्मीद होती है | ‘दास्ताँ तो सुनायेंगे’ ग़ज़ल में शायर मुहब्बत को निभाने की बात कहता है ---
“ जग कुछ भी कहे दास्ताँ तो सुनायेंगे,
साथ मोहब्बत का निभाते ही जायेंगे |”
----------कविवर डा श्यामगुप्त पर गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टेगोर के साहित्य का प्रभाव परिलक्षित होता है | टेगोर ने कहा था जब कोइ साथ न दे तो..’एकला चलो रे’ | यही बात डा श्यामगुप्त ने ‘दुष्कर राहों’ में कही है....
“कहने को तैयार थे मरहम लिए,
हम यूंही बस दर्द अपने सह गए |
साथ कोई दे भला या नहीं दे ,
श्याम अपने राह चलते हम गए |”

--------- कवि डा श्यामगुप्त अध्यात्म से जुड़े हुए हैं | ‘बात करें’ शीर्षक त्रिपदा अगीत ग़ज़ल में वे कहते हैं.....
“ शीश झुकाएं क्यों पश्चिम को,
क्यों अतीत से हम भरमायें :
कुछ आदर्शों की बात करें |
“जीवन गम व खुशी दोनों है,
बात नहीं यदि कुछ बन पाए:
कुछ भजन ध्यान की बात करें |”

---------- ‘उनकी महफ़िल से’ नज़्म की दो पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं ---
“अब न हम उठ पायंगे उनकी महफ़िल से,
बुलाया जब उसी ने हसरते दिल से | “
-------आज़ाद नज्में खंड की एक नज़्म ‘प्यार है’ में प्यार की महत्ता पर अपनी बात व्यक्त करते हुए वे कहते हैं.....
“हमें तो प्यार से प्यार है,
प्यार के अहसास से प्यार है,
प्यार के नाम से प्यार है :
प्यार को सीने में लिए,
मर सकें तो, हमें-
उस प्यारी मौत से प्यार है |”

---------रुबाइयाँ खंड में एक रुबाई ‘दिन’ शीर्षक से देखें.....
“सो गया थक कर के दिन
रात के आगोश में,
जैसे इक नटखट सा बच्चा
सोता माँ की गोद में |”

--------- इसीप्रकार ‘ईश्वर ‘ शीर्षक से ईश्वर की सत्ता दर्शाते हुए एक कतआ देखिये----
“वे कहते हैं ईश्वर कहीं नहीं है,
कभी किसी ने कहीं देखा नहीं है |
मैंने कहा ज़र्रे ज़र्रे में है काविज ,
बस खोजने में ही कमी कहीं है ||”
-----------आज़ाद शे’र खंड से दो शे’र प्रस्तुत हैं---
“ हम तो बरवाद हुए हैं ज़माने के लिए
तुमने क्यों मेरी खातिर ये इलज़ाम लिया |
मेरी मोहब्बत के चराग कहीं और जल,
इतना अन्धेरा है यहाँ तू खुद पे शरमायेगा |”
---------- इस प्रकार यह काव्य संग्रह ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ शायरी के क्षेत्र में एक मील-स्तम्भ का कार्य करेगा, ऐसा मेरा मानना है | मेरा यह भी मत है कि शायरी के क्षेत्र में नए रचनाकारों को यह संग्रह प्रेरणादायक सिद्ध होगा |

---------- कृति की भाषा हिन्दी-उर्दू मिश्रित है | देवनागरी लिपि में लिखा गया यह संग्रह अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर अपनी पहचान बनाएगा | शैली बोधगम्य है, इसे समझने के लिए शब्द-कोष की आवश्यकता नहीं है और यही डा श्यामगुप्त जी के लेखन की निजी विशेषता है |
-----------बहुत से शायर अरबी-फारसी के कठिन शब्दों का प्रयोग करके अपनी रचना को आम पाठकों से दूर कर देते हैं परन्तु डा श्यामगुप्त की शायरी में यह दुरूहता कहीं भी परिलक्षित नहें होती | सभी रचनाएँ प्रसाद गुण से युक्त हैं | अलंकारों का प्रयोग भी देखने को मिलता है, जिसमें अनुप्रास अलंकार का प्रयोग बहुतायत से हुआ है |
--------- साहित्य की हर विधा पद्य व गद्य में निष्णात महाकवि डा श्यामगुप्त ने अगीत काव्य-विधा में भी महाकाव्य व खंडकाव्य का प्रणयन करके देश से बाहर विदेशों तक में अपनी पहचान बनाई है| भविष्य में वे और अधिक कृतियों का प्रणयन करके माँ भारती के भंडार को भरने में अवश्य ही सक्षम होंगे |

--------- डा श्यामगुप्त ने यह शायरी संग्रह अपनी प्रेरणास्रोत वरिष्ठ कवयित्री व धर्मपत्नी श्रीमती सुषमा गुप्ता जी को समर्पित करके उनके प्रति अपनी आस्था प्रकट की है| आपके लेखन में आपके पुत्र, पुत्रवधू, बेटी, जामाता तथा उनके बड़े भाई आदि का भी प्रोत्साहन समय समय पर मिलता रहता है | “वादे वादे जायते” तत्व बोध: के परिवेश में मैं इस शायरी संग्रह का स्वागत करता हूँ |

शुभकामनाओं सहित |
डा रंग नाथ मिश्र ‘सत्य’ एम् ए,पीएचडी,सा.रत्न
संस्थापक/अध्यक्ष
अ.भा.अगीत परिषद्,लखनऊ – १७
अगीतायन,
ई-३८८५,राजाजीपुरम, लखनऊ -१७
डू भा,-०५२२-२४१४८१७ , मो-९३३५९९०४३५ .
दि. १५-४-२०१४ ई

शल्य निसृत शायरी----- डा सुलतान शाकिर हाशमी ......कुछ शायरी की बात होजाए ----

                                           कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित
 
  


                         शल्य निसृत शायरी   
                           (ड़ा सुलतान शाकिर हाशमी )
   
          डा श्यामगुप्त जो कि एक सुप्रसिद्ध शल्य-चिकित्सक एवं सफल साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं, इन्होंने ‘सृष्टि’, शूर्पणखा, प्रेमकाव्य जैसे वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं पौराणिक महाकाव्य, महिला सशक्तीकरण पर ‘इन्द्रधनुष’ जैसे उपन्यास एवं ‘अगीत साहित्य दर्पण’ जैसे शास्त्रीय छंद-विधान आदि कृतियों तथा उनकी पत्नी श्रीमती सुषमा गुप्ता द्वारा प्रस्तुत कृति ‘ब्रज बांसुरी’ के द्वारा साहित्य जगत को माधुर्य रूप प्रस्तुत करके अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहे हैं, जो कि अनंतता का प्रतीक है |
         अब डा श्यामगुप्त जी की एक और कृति, ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ प्रस्तुत है जो कि एक सुन्दर प्रस्तुति है | ये सुन्दर होने के साथ-साथ मनोहर एवं प्रभावी ग़ज़लों का एक ऐसा हसीन गुलदस्ता है जिसमें भाव–वैविध्य की भीनी-भीनी महक पाठक को अपनी और आकर्षित करने में समर्थ है | इनकी ग़ज़लों में प्रेम, त्याग, हालात, इश्क-मोहब्बत, समाज में फ़ैली हुई कुरीतियों का वर्णन बहुत ही सुन्दर ढंग से किया गया है | सभी गज़लें अच्छी हैं बल्कि कुछ अशआर तो बहुत सुन्दर हैं जो जनमानस पटल पर छाप छोड़ते नज़र आते हैं | इनकी ग़ज़लों को पढ़ते-पढ़ते भाषा की सरलता और दिल को मोह लेने वाले शब्दों में डूब जाने का मन होता है |
       मैंने जब डा श्यामगुप्त जी के इस ग़ज़ल संग्रह को पढ़ना शुरू किया तो मन के कटु यथार्थ को स्पर्श करती ये गज़लें समकालीन सन्दर्भों को भी बड़ी बारीकी के साथ व्यंजित करतीं हमें नज़र आईं | मुझे इनके इस ग़ज़ल-संग्रह में देश और समाज के लिए पीड़ा का सागर एवं प्रणय संवेदनाओं का सफल चित्रण साफ़-शफ्फाक नज़र आता है और जीवन-जगत की प्रौढ़ अनुभूतियों की प्रामाणिक अभिव्यक्ति विशेष रूप से नज़र आती है |
       डा श्यामगुप्त जी ने स्वयं लिखा है, “शायरी, अरबी फारसी एवं उर्दू जुबान की काव्य-कला है जिसमें ग़ज़ल की लोकप्रियता सबसे अधिक पायी जाती है...|” मैं समझता हूँ किसी लोकप्रिय विधा में कलम उठाना बहुत कठिन कार्य है, क्योंकि हर लोकप्रिय वस्तु का सीधा सम्बन्ध दिल से होता है, जो किसी अच्छी बात पर जितनी जल्दी खुश होता है तो उतनी ही जल्द उसके टूटने की भी संभावना बनी रहती है, इसलिए ग़ज़ल कहना जितना आसान है उतना ही मुश्किल भी |  डा श्यामगुप्त जी लिखते हैं तो ऐसा महसूस होता है की हर शब्द उनके ज़ज्वात को बयाँ
    कर रहा है जिसमें ज़िंदगी का सुबहाना चित्रण भी दिखाई देता है और हालात की कडुवाहट भी नज़र आती है | जैसे ये शे’र देखिये----
“ये ग़ज़ल कितनी प्यारी है,
गोया ज़िंदगी ने संवारी है |”
        ***
“ज़िंदगी एक ग़ज़ल है, तरन्नुम से जिया जाए,
न हो साकी तो, बिन पैमाना ही पिया जाए | “
       उनकी नज़र में रूह का बोझ इतना अधिक होता है जिसे कमजोर काँधे नहीं उठा सकते, जिसे डा श्याम गुप्त इस तरह से अपने अशआर में पेश करते हैं ---
“जहाँ था दिल वहीं रखदो,
हाथ का जाम यहीं रखदो |
     ***
थक गए हैं अब काँधे,
रूह का बोझ कहीं रख दो |”

       डा श्याम गुप्त जी समाज में फ़ैली हुई अश्लीलता और समाज की बुराइयां पर तमाशबीनों की तरह लोगों की खामोशी को इस तरह बयाँ करते हैं----
“लोग आखिर ये बात कब समझेंगे,
बदले शहर के हालात, कब समझेंगे |

ये है तमाशबीनों का शहर यारो,
कोइ ने देगा साथ, कब समझेंगे |

बढ़ रही अश्लीलता सारे शहर में,
सब सो रहे चुपचाप, कब समझेंगे |

          डा श्याम गुप्त जी अपने हौसले और हिम्मत को इस तरह अपने अशआर में बयाँ करते हैं जैसे हकीकत बयाँ कर रहे हों | वह हर व्यक्ति को आज टूटते हुए आईने की तरह देखते हैं, दुश्मन को दोस्त बनाने का पैगाम देते हुए आतंक की फसल पर ख़ूबसूरत कटाक्ष इस तरह से करते हैं-----



  
“यूं तो खारों से ही अपनी आशनाई है ,
आंधियां भी तो सदा हमको रास आयीं हैं |

आशिकी उससे करो,श्याम हो दुश्मन कोई ,
दोस्त दुश्मन को बनाए वो आशनाई है |
      ******
टूटते आईने सा हर व्यक्ति यहाँ क्यों है,
हैरान सी नज़रों के ये अक्स यहाँ क्यों हैं |

तुलसी सूर गालिव की सरजमीं ये श्याम,
आतंक की फसल सरसब्ज़ यहाँ क्यों है |     
 ****
मिली हवाओं में उड़ने के ये सज़ा यारो,
कि मैं जमीं के रिश्तों से कट गया यारो|

आधुनिक दौर है बोतल का नीर पीते हैं,
नीर नदियों का तो कीचड से पट गया यारो |
       डा श्याम गुप्त जल-जीवन का राग अलापने वालों को और लम्बी-लम्बे बातें करने वालों को इस अशआर के द्वारा ख़ूबसूरत पैगाम इस तरह देते हैं---
“गली सड़क चौराहों के गड्ढे भर नहीं पाए हैं,
चाँद पर घर बसाने के ख़्वाब लाये हैं|
    
ढूँढने चले हैं जल और जीवन मंगल पर,
पृथ्वी के जल को सुधार नहीं पाए हैं |”
            डा श्याम गुप्त जहां इश्क-मोहब्बत को अपनी शायरी का दर्पण बनाते हैं वहीं मय व जाम पर भी जौहर दिखाते हुए नज़र आते हैं ----
“तुम जो कहते हो कि पीने की क्या ज़रुरत है,
गोया कहते हो कि जीने की क्या ज़रुरत है |

इश्के-दरिया के तूफाँ में गर्क होते हैं ,
आप कहते हैं सफीने की क्या ज़रुरत है |






         इसी तरह डा गुप्त उर्दू शायरी की एक और विधा ‘नज़्म’ को अपनाते हुए कहते हैं ----
“किस अदा से मेरी नज़्म को गुनगुनाया ज़नाब,
ओठों पे खिलखिला उठे जैसे कई गुलाब  |”
             
             डा श्याम गुप्त ने ‘आज़ाद नज्में’, रुबाइयां, कतआ, आज़ाद शे’र कहके उर्दू शायरी की हर विधा पर अपनी कलम दौडाने का एक सफल प्रयास किया है | इसलिए मैं कह सकता हूँ कि डा श्याम गुप्त जीवन, समाज एवं उर्दू साहित्य के विभिन्न पक्षों और विधाओं को प्रभावशाली ढंग से रखने में कामयाब रहे हैं और उन्होंने ग़ज़ल, रुबाई, आज़ाद शे’र ,आज़ाद नज्में एवं नज़्म के तेबर के अनुकूल शब्दों का प्रयोग किया है और एक बार फिर वह लोकप्रिय शायरी साहित्य को देने में सफल रहे हैं | मैं उनको इस अद्वितीय कृति के लिए बधाई देता हूँ और ईश्वर से कामना करता हूँ कि उनका कलम इसी प्रकार साहित्य की सेवा में तत्पर रहे |

डा सुलतान शाकिर हाशमी
पूर्व सलाहकार सदस्य,
योजना आयोग, भारत सरकार
१३३/१३.नजीराबाद , लखनऊ
मो. ९२३६०५३१६९—८०९०३०१४७१ ...







 

'कुछ शायरी की बात होजाए ' १.अपनी ही चाल ढालते हम शायरी रहे -सुषमा गुप्ता ...

                                             कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

मेरी सद्य प्रकाशित पुस्तक' ---कुछ शायरी की बात होजाए '----





 

अपनी ही चाल ढालते हम शायरी रहे ---- श्रीमती सुषमा गुप्ता..                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                     
                  सदैव की भांति प्रस्तुत कृति में भी डा श्यामगुप्त की साहित्य व कविता में रूढ़िवादिता के प्रति विद्रोही प्रवृत्ति, नवीनता के प्रति ललक एवं नए-नए प्रयोगों की भावभूमि परिलब्ध है | साहित्य, दर्शन, धर्म, अद्यात्म की अभिरुचि संपन्न एवं स्वतन्त्रता-संग्राम के क्रांतिकारियों के साथी-सद्भावी रहे पिता के पुत्र होने के नाते उनमें अव्यवस्था, असामाजिकता, रूढ़िवादिता आदि के विरुद्ध विद्रोह के स्वर सहज स्वाभाविक रूप से विद्यमान हैं और विज्ञान के छात्र होने के नाते नवीनता व प्रगतिशीलता के विचारों व स्थापनाओं के | वे साहित्य के मूल भाव… भाव-प्रवणता, सामाजिक-सरोकार, जन-आचरण संवर्धन एवं प्रत्येक प्रकार की प्रगतिशीलता, नवीनता के संचरण, गति-प्रगति के हामी हैं | कविता के मूल गुण – गेयता, लयबद्धता, प्रवाह, सहज़-सम्प्रेषणीयता के समर्थन के साथ-साथ डा श्यामगुप्त सिर्फ छंदीय कविता, सिर्फ सनातनी छंद, गूढ़ शास्त्रीयता एवं शायरी–ग़ज़लों में भी पुरानी रूढ़िवादिता व लीक पर ही चलते रहने के हामी नहीं हैं अपितु नवीन प्रयोगों व स्थापनाओं को काव्य, साहित्य व समाज की उन्नति-प्रगति हेतु आवश्यक मानते हैं जो विभिन्न समारोहों में उनके वक्तव्यों, कथनों, रचनाओं, आलेखों, कहानियों, समीक्षाओं व अंतरजाल पर ब्लोगों पर यथातथ्य टिप्पणियों से प्रदर्शित होता है | परन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं कि साहित्य व काव्य को मूल उद्देश्यों व गुणों से विरत कर दिया जाए, नवीनता के नाम पर मात्राओं-पंक्तियों को जोड़-तोड़ कर, विचित्र-विचित्र शब्दाडंबर, तथ्यविहीन कथ्य, विरोधाभासी कथ्य आदि को प्रश्रय दिया जाय| 

    उनका कथन है कि ---
                     ‘साहित्य सत्यम शिवम् सुन्दर भाव होना चाहिए,
                      साहित्य शुभ शुचि ज्ञान पारावार होना चाहिए |’

                    ‘ श्याम’ मतलब सिर्फ होना शुद्धतावादी नहीं ,
                      बहती दरिया रहे पर तटबंध होना चाहिए |’

       
उनके अनुसार साहित्य की प्रत्येक विधा पर अधिकार होना एवं नए-नए  प्रयोग व स्थापनाओं से सम्बद्ध होना एक संपूर्ण साहित्यकार का गुण है| आपने स्वयं कई नवीन तुकांत व अतुकांत छंदों की सर्जना की है एवं वे अतुकांत कविता की एक विशिष्ट शाखा, अगीत-विधा, के भी पूर्ण समर्थक हैं जिसे अधिकांश सामान्य रूढ़िवादी साहित्यकार अछूत समझते रहे हैं| जिसका छंद–विधान ‘अगीत साहित्य दर्पण’ भी आपने लिखा है|
         प्रस्तुत कृति में भी उनका ये स्वर मुखरित है | मूलतः शायरी व ग़ज़ल के कठोर नियमों व कलेवर आदि की लीक पर ही चलते रहना उन्हें अभीष्ट नहीं | काव्य के मूल गुण- गेयता, लय. प्रवाह, भाव व अर्थ-स्पष्टता को वे यथेष्ट मानते हैं, जब वे कहते हैं...
         ‘यदि चाहते हैं दिल से निकले गीत-ग़ज़ल,
         तो उसे नियमों की अति से न लादा जाए |’     एवं.....

         ‘मतला बगैर हो ग़ज़ल हो रदीफ़ भी नहीं,
         यह तो ग़ज़ल नहीं ये कोई  वाकया नहीं |’

अपनी नवीनताओं, स्थापनाओं को वे स्पष्ट करते भी हैं....

        ‘अपनी ही चाल ढालते ग़ज़लों को हम रहे,
         पैमाना  कोई नहीं, कोई  साकिया  नहीं |’ 

      हमें स्वयं शायरी-ग़ज़लों के शिल्प आदि का विशिष्ट ज्ञान नहीं है, हाँ गा लेते हैं अतः हमारे द्वारा ये विविध विषयक रचनाएँ समारोहों, गोष्ठियों, मंचों पर गाई जाती रही हैं | इस प्रकार गेयता ही इन रचनाओं का मूल भाव है जैसा लेखक ने स्वयं कहा है ...

       ‘लय गति हो ताल सुर सुगम, आनंदरस बहे,
        वह भी ग़ज़ल है, चाहे कोइ काफिया नहीं |’

मुझे आशा है इन्हें पढ़कर विज्ञजनों एवं पाठकों को अवश्य आनंदरस की अनुभूति मिलेगी |

सुषमा गुप्ता
सुश्यानिदी, के-३४८. आशियाना, लखनऊ .