saahityshyamसाहित्य श्याम

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शनिवार, 20 जून 2009

दीपक राग--

पतन्गा,परवाना,दीवाना,
क्या प्रदर्शित करता है,
तुम्हारा यूं जल जाना ?

दीपक कहां--
प्रीति की रीति को पहचानता है?
क्या व्यर्थ नहीं है ,
तुम्हारा यूं छला जाना ?

अर्ध मूर्छित परवाना ,तड्फ़डाया,
बेखुदी मे यूं बडबडाया--अरे,दुनिया वालो!
यही तो सच्चा प्यार है;
प्यार विना तो जीना बेकार है ।
शमा बुलाये तो सही,
मुस्कुराये तो सही,
परवाना तो एक नज़र पर-
मिटने को तैयार है।
इसीलिये तो अमर प्रेम पर,
शमा-पर्वाना का अधिकार है ।

दीपशिखा झिल मिलाई,
लहराकर खिल खिलाई ;
दुनियावाले व्यर्थ शन्का करते हैं,
प्यार करने वाले -
जलने से कहां डरते हैं!
पतन्गों के प्यार में ही तो हम,
तिल तिल कर जलते हैं ।

वे मर मर कर जीते हैं,
जल जल कर मरते हैं ।
हम तो पिघल पिघल कर ,
आखिरी सांस तक,
आंसूं बहाते हैं ।
पतन्गे की किस्मत में-
कहां ये पल आते है ॥

2 टिप्‍पणियां:

gargi gupta ने कहा…

वे मर मर कर जीते हैं,
जल जल कर मरते हैं ।
हम तो पिघल पिघल कर ,
आखिरी सांस तक,
आंसूं बहाते हैं ।

bhut hi achchhi line
kya baat hai aap to chha gaye

डा. श्याम गुप्त ने कहा…

ध्न्य्वाद गार्गी जी,
सभी की किस्मत में कहां ये पल आते हैं।