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शुक्रवार, 12 जून 2009

मुझे न छेडो....गज़ल

मुझे न छेडो इस मानस में ज्वाला मुखी भरे हैं।
जाने क्या-क्या कैसे कैसे अन्तर्द्वन्द्व भरे हैं।

क्या पाओगे घावों को सहलाकर इस तन-मन के,
क्या पाओगे छूकर तन के मन के घाव हरे हैं।

खुशियों की सरगम हो,या हो पीडा की शहनाई,
हंस-हंस कर हर राग सजाया ,बाधा से न डरे हैं।

कोने-कोने क्यों छाई आतन्कवाद की छाया ,
सामाज़िक शुचि मूल्य आज टूटॆ-टूटे बिखरे हैं।

हमने अतिसुखअभिलाषा में आग लगाई घर को,
कटु बातें कह्डालीं हमने मन के भाव खरे हैं।

जिसने खुद को कठिन परिश्रम,जप-तप योग तपाया,
वे ही सोने जैसा तपकर इस जग में निखरे हैं।

एक भरोसा उसी राम का,जग- पालक- धारक है,
श्याम’ क्रपा से जाने कितने भव-सागर उतरे हैं

3 टिप्‍पणियां:

Babli ने कहा…

उम्दा ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

Sweet Gabru ने कहा…

वाह! रे ज्वालामुखी बहुत खूब!
इस ज्वालामुखी को कलम के जरिये
लोगो तक पहुचाते रहे !
हमारी शुभ कामनाएं !

shyam Gupta ने कहा…

धन्यवाद -बबली व स्वीट गबरू