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शुक्रवार, 12 जून 2009

मुझे न छेडो....गज़ल

मुझे न छेडो इस मानस में ज्वाला मुखी भरे हैं।
जाने क्या-क्या कैसे कैसे अन्तर्द्वन्द्व भरे हैं।

क्या पाओगे घावों को सहलाकर इस तन-मन के,
क्या पाओगे छूकर तन के मन के घाव हरे हैं।

खुशियों की सरगम हो,या हो पीडा की शहनाई,
हंस-हंस कर हर राग सजाया ,बाधा से न डरे हैं।

कोने-कोने क्यों छाई आतन्कवाद की छाया ,
सामाज़िक शुचि मूल्य आज टूटॆ-टूटे बिखरे हैं।

हमने अतिसुखअभिलाषा में आग लगाई घर को,
कटु बातें कह्डालीं हमने मन के भाव खरे हैं।

जिसने खुद को कठिन परिश्रम,जप-तप योग तपाया,
वे ही सोने जैसा तपकर इस जग में निखरे हैं।

एक भरोसा उसी राम का,जग- पालक- धारक है,
श्याम’ क्रपा से जाने कितने भव-सागर उतरे हैं॥

शनिवार, 6 जून 2009

श्याम लीला -२ --नाग -नथैया--जल प्रदूषण

१.
कालिंदी का तीर औ ' वंशी -धुन की टेर,
गोप-गोपिका मंडली , नगर लगाती फेर ।
नगर लगाती फेर ,सभी को यह समझाती ,
ग्राम,नगर की सभी गन्दगी जल में जाती ।
विष सम काला दूषित जल है यहाँ नदी का ,
बना सहस-फन नाग ,कालिया कालिंदी का।।

२.
यमुना तट पर श्याम ने वंशी दई बजाय,
चहुँ -दिशि,मोहिनि फेरकर,सबको लिया बुलाय।
सब को लिया बुलाय , प्रदूषित यमुना भारी ,
करें सभी श्रम दान , स्वच्छ हो नदिया सारी ।
तोड़ किया विष हीन , प्रदूषण नाग का नथुना ,
फन-फन नाचे श्याम,झरर-झर झूमी यमुना ॥

शुक्रवार, 5 जून 2009

क्रष्ण लीला - - १.-रास व महारास-कुन्डली छन्द

            (क). रास- न्रित्य, गायन वादन
गाते धुन वन्शी रखे,  ओठों पर घन श्याम,
न्रत्य राधिका कर रहीं      ब्रन्दावन के धाम।
व्रन्दावन के धाम,न्रत्य रत    सब ही गोपीं,
कुसुमा ललिता आदिसभी राधा सखि जो थीं।
थकीं गोपियां    पैर न थक पाते     राधा के,
जब तक’श्याम, श्याम रहते वन्शीधुन गाते।

             (ख) रास

व्रन्दावन के कुन्ज में,रचें रास अभिराम,
झूमें गोपी-गोपिका ,नाचें राधा-श्याम  ।
नाचें राधा श्याम,पूछते   ओर बतलाते,
किसने क्या-क्या देखा मथुरा आते-जाते।
कौन वर्ग,सरदार  विरोधी हैं शासन के,
श्याम, पक्ष में आजायेंगे व्रन्दावन के   ।

          (ग). महारास

सखियां  सब   समझें यही,  मेरे ही   संग   श्याम,
सभी  गोपियां   समझतीं,  मेरे  ही     घनश्याम   ।
मेरे ही  घनश्याम,  श्याम संग   राधाजी मुस्कातीं,
भक्ति-भाव,तद रूप,स्वयम सखियां कान्हा होजाती।
एक ब्रह्म, भा्षै कण-कण,माया वश सबकी अंखियां,
मेरे ही संग  श्याम”  श्याम’ समझें    सब सखियां॥   
                              -क्रमशः 

बुधवार, 3 जून 2009

पीर मन की

जान लेते   पीर मन की     तुम अगर,
तो न भर निश्वांस झर-झर अश्रु झरते।
देख लेते जो  द्रगों के  अश्रु कण  तुम  ,
तो नहीं     विश्वास के  साये   बहकते ।

जान  जाते तुम कि तुमसे प्यार कितना,
है हमें,ओर तुम पे है एतवार  कितना  ।
देख लेते तुम अगर इक बार मुडकर  ,
खिल खिला उठतीं कली गुन्चे महकते।
 
महक उठती पवन,खिलते कमल सर में,
फ़ूल उठते सुमन करते भ्रमर गुन गुन ।
गीत अनहद का गगन् गुन्जार देता ,
गूंज उठती प्रक्रिति मेंवॊणा की गुन्जन ।

प्यार की   कोई भी   परिभाषा  नहीं है ,
मन के  भावों की कोई  भाषा नहीं है ।
प्रीति की भाषा नयन पहिचान लेते ,
नयन नयनों से मिले सब जान लेते ।

झांक लेते तुम जो इन भीगे द्रगों में,
जान  जाते पीर मन की प्यार मन का।
तो अमिट विश्वास के साये  महकते,
प्यार की निश्वांस के पन्छी चहकते ॥  

शीर्षक ,मुखडा या ्गीत दें

शीर्षक ,मुखडा,या  कोई प्रिय गीत दें-----              







मंगलवार, 2 जून 2009

आख़िर क्यूं ये पुरवा आई ---गीत

मन की प्रीति पुरानी को , क्यों हवा दे गयी ये पुरवाई ।
सुख की नींद व्यथा सोयी थी ,आख़िर ये क्यों पुरवा आई?

हम खुश खुश थे जिए जारहे ,जीवन सुख रस पिए जारहे ,
मस्त मगन सुख की नगरी में ,सारा सुख सुंदर गगरी में ;
सुस्त पडी उस प्रीती रीति को,छेड़ गयी क्यों ये पुरवाई ।

प्रीति-वियोगके भ्रमकी बाती,जलती मन में विरह कथा सी ,
गीत छंद रस भाव भिगोये,ढलती बनकर मीत व्यथा सी ;
पुरवा जब संदेशा लाई , मिलने का अंदेशा लाई ।

कैसे उनका करें सामना , कैसे मन को धीर बंधेगी ,
पहलू में जब गैर के उनको,देख जले मन प्रीति छलेगी ;
कैसे फ़िर ये दिल संभलेगा ,मन ही तो है मन मचलेगा।

क्यों ये पुरवा फ़िर से आई, क्यों नूतन संदेशा लाई ॥

सोमवार, 1 जून 2009

एक ग़ज़ल --त्रिपदा --दर्दे दिल

यादों के ज़जीरे उग आए हैं ,

मन के समंदर में ;
कश्ती कहाँ-कहाँ लेजायें हम ।

दर्दे दिल उभर आए हें ,ज़ख्म बने ,
तन की वादियों में ;
मरहम-इश्क कहाँ तक लगाएं हम ।

तन्हाई के मंज़र बिछ गए हैं ,
मखमली दूब बनकर ;
बहारे हुश्न कहाँ तक लायें हम ।

रोशनी की लौ कोई दिखती नहीं ,
इस अमां की रात में ;
सदायें कहाँ तक फैलाएं हम।

वस्ल की उम्मीद ही नहीं रही श्याम ,
पयामे इश्क सुनकर ;
दुआएं कहाँ तक अब गायें हम॥