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रविवार, 2 अगस्त 2009

काव्य-दूत---गत पोस्ट से आगे....

हो गम जहां

हो गम न जहां ,सुख हो या हो दुख
एसा इक जग हो अपना ।
वो कल कभी तो आयेगा ही,
चाहे आज हो केवल सपना।

हम जियें जहां औरों के लिये,
कोई न पराया अपना हो।
दुनिया हो दुनिया की खातिर ,
बस प्यार ही सुन्दर सपना हो।

औरों की खुशी अपने सुख हों,
उनके दुख अपने दर्द बनें।
हो शत्रु न कोई मीत जहां,
सब ही सब के हमदर्द बनें।

हो झूठ न सच,सत और असत,
ना स्वर्ग -नरक की माया हो।
बस प्रीति की रीति हो उस जग में,
और प्यार की सब पर छाया हो।

हो गम न जहां.......................॥

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