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शनिवार, 15 अगस्त 2009

सृष्टि -ईशत -इच्छा या बिग-बेंग ;एक अनुत्तरित उत्तर ( अगीत विधा महाकाव्य)


सृष्टि -अगीत विधा महाकाव्य
रचयिता--
डा.श्याम गुप्त
प्रकाशक-
अखिल भा.अगीत परिषद् ,लखनऊ.
प्रथम सं- मार्च,३०-२००६ , चैत्र शुक्ला .प्रतिपदा , नवसंवत्सर दिवस -२०६३ ( आदि सृष्टि दिवस ), मूल्य--७५/-
अगीत विधा में ब्रह्माण्ड की रचना एवं जीवन की उत्पत्ति के,वैदिक, दार्शनिक व आधुनिक वैज्ञानिक तथ्यों का विवेचनात्मक प्रबंध-काव्य। ( छंद ----लय बद्ध,षटपदी अगीत छंद ---छह पंक्ति,१६ मात्रा,अतुकांत ,लय-वद्ध )

प्रथम-सर्ग --वन्दना

१-गणेश -
गण-नायक गज बदन विनायक ,
मोदक प्रिय,प्रिय ऋद्धि-सिद्धि के ;
भरें लेखनी में गति,गणपति ,
गुण गाऊँ इस 'सृष्टि',सृष्टि के।
कृपा 'श्याम, पर करें उमासुत ,
करून वन्दना पुष्पार्पण कर।।

-सरस्वती --
वीणा के जिन ज्ञान स्वरों से,
माँ! ब्रह्मा को हुआ स्मरण'१' |
वही ज्ञान स्वर ,हे माँ वाणी !
ह्रदय तंत्र में झंकृत करदो |
सृष्टि ज्ञान स्वर मिले श्याम को,
करू वन्दना पुष्पार्पण कर॥

-शास्त्र -
हम कौन, कहाँ से आए हैं ?
यह जगत पसारा किसका,क्यों ?
है शाश्वत यक्ष- प्रश्न,मानव का।
देते हैं, जो वेद-उपनिषद् ,
समुचित उत्तर ,श्याम उन्ही की,
करून वन्दना पुष्पार्पण कर॥

४-ईश्वर-सत्ता --
स्थिति,सृष्टि व लय का जग के,
कारण-मूल जो वह परात्पर;
सद-नासद में अटल-अवस्थित ,
चिदाकास में बैठा -बैठा ,
संकेतों से करे व्यवस्था,
करून वन्दना पुष्पार्पण कर ॥

५-ईषत-इच्छा --'२'
उस अनादि की ईषत-इच्छा
महाकाश के भाव अनाहत,
में, जब द्वंद्व-भाव भारती है ;
सृष्टि-भाव तब विकसित होता-
आदि कणों में, उस इच्छा की,
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥

६- अपरा -माया --
कार्यकारी भाव-शक्ति है,
उस परात्पर ब्रह्म की जो;
कार्य -मूल कारण है जग की,
माया है उस निर्विकार की;
अपरा'३' दें वर ,श्याम ,सृष्टि को,
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥

७.चिदाकाश --
सुनना भवन'४' में अनहद बाजे ,
सकल जगत का साहिब बसता;
स्थिति,लय और सृष्टि साक्षी,
अंतर्मन में सदा उपस्थित,
चिदाकाश की, जो अनंत है;
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥

८-विष्णु --
हे ! उस अनादि के व्यक्त भाव,
हे! बीज रूप हेमांड'५' अवस्थित ;
जग पालक,धारक,महाविष्णु,
कमल-नाल ब्रह्मा को धारे ;
'श्याम-सृष्टि' को, श्रृष्टि धरा दें,
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥

९-शंभु-महेश्वर --
आदि-शंभु -अपरा संयोग से,
महत-तत्व'६' जब हुआ उपस्थित,
व्यक्त रूप जो उस निसंग का।
लिंग रूप बन तुम्ही महेश्वर !
करते मैथुनि-सृष्टि अनूप;
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥

१०-ब्रह्मा --
कमल नाल पर प्रकट हुए जब,
रचने को सारा ब्रह्माण्ड;
वाणी की स्फुरणा'७' पाकर,
बने रचयिता सब जग रचकर ।
दिशा-बोध मिल जाय 'श्याम,को;
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥

११-दुष्ट जन -वन्दना --
लोभ-मोह वश बन खलनायक,
समय-समय पर निज करनी से;
जो कर देते व्यथित धरा को ।
श्याम, धरा को मिलता प्रभु का,
कृपाभाव ,धरते अवतार;
करूँ वन्दना पुष्पार्पण कर॥

( १=सृष्टि ज्ञान का स्मरण ,२=सृष्टि-सृजन की ईश्वरीय इच्छा, ३= आदि-मूल शक्ति , ४=शून्य,अनंत-अन्तरिक्ष ,क्षीर सागर, मन ; ५=स्वर्ण अंड के रूप में ब्रह्माण्ड; ६=मूल क्रियाशील व्यक्त तत्व ; ७=ज्ञान का पुनः स्मरण )

----------------क्रमशः

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