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शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

काव्य-दूत से --आगे----

निर्मोही

कितना निर्मोही है ये जीव,
ये आत्मा,ये जीवात्मा।

चल देता है तोड़कर ,
एक ही पल में,
सारे बंधन,रिश्ते-नाते ,
उन्मुक्त आकाश की ओर,
निर्द्वंद्व ,निर्बाध ,स्वतंत्र,मोह मुक्त ,
मुक्ति की ओर।
और, पीछे रह जाता है,माटी का शरीर,
सदने को,गलने को,या फ़िर जलने को,
उसी माटी में मिलने को ।

यही गति है शरीर की,
यही मुक्ति है आत्मा की।

पर क्या वस्तुतः ,यह जीव-
मुक्त हो जाता है ,संसार से ,
कैद रहता है वह सदा ,
मन में,
आत्मीयों के याद रूपी,
बंधन में,और-
हो जाता है अमर।

अमरत्व व मुक्ति ,
सर्वथा भिन्न हैं;
फ़िर भी,
एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

अतः मुक्त होकर इस जगत से ,
बंधन से,
विश्व में ही अमरता के बंधन में ,
जीव बाँध जाता है;
सिर्फ़ उसका आयाम बदल जाता है।

यही मृत्यु है,
यही अमरता ,
यही मुक्ति,
यह जीवन-सरिता॥

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