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शनिवार, 23 मई 2020

डा श्याम गुप्त के अभिनन्दन ग्रन्थ 'अमृत कलश----आलेख ७,,डा श्याम गुप्त के उपन्यास ‘इन्द्रधनुष’ का अनुशीलन ---डा रंगनाथ मिश्र सत्य

                                      कविता की भाव-गुणवत्ता के लिए समर्पित

डा श्याम गुप्त के अभिनन्दन ग्रन्थ 'अमृत कलश का लोकार्पण २२-०२-२०२० को हुआ |---तुरंत लौकडाउन के कारण कुछ विज्ञ लोगों तक नहीं पहुँच पा रही है अतः --यहाँ इसे क्रमिक पोस्टों में प्रस्तुत किया जाएगा | प्रस्तुत है - -पंचम पुष्प ---आलेख-७.-- डा श्याम गुप्त के उपन्यास ‘इन्द्रधनुष’ का अनुशीलन  ---डा रंगनाथ मिश्र सत्य
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            डा श्याम गुप्त के उपन्यास ‘इन्द्रधनुष’ का अनुशीलन  ---डा रंगनाथ मिश्र सत्य
     
             डा श्यामगुप्त ने प्रचुर मात्रा में गद्य साहित्य का सृजन किया है| गद्य-विधा में दो प्रकाशित पुस्तकों –इन्द्रष उपन्यास धनुएवं अगीत साहित्य दर्पण के अतिरिक्त ... ३०० अगीत छंद, ६० कथाएं व २०० से अधिक आलेख, स्त्री-विमर्श, वैज्ञानिक-दार्शनिक, सामाजिक, पौराणिक-एतिहासिक विषयों, हिन्दी व साहित्य आदि विविध विषयों पर लिखे जा चुके हैं एवं आप अनेक निवंध,समीक्षाएं,पुस्तकों की भूमिकाएं आदि भी लिख चुके हैं एवं ‘श्याम-स्मृति’ शीर्षक से क्रमिक लघु निबंध भी लिखे जा चुके हैं|ये सभी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं |आपने अनेक पुस्तकों की समीक्षाएं, भूमिकाएं आदि भी लिखी हैं | यहाँ हम उनके उपन्यास इन्द्रधनुष पर चर्चा करेंगे |
               डा श्याम गुप्त के उपन्यास - इन्द्रधनुष की मूल विषय वस्तु  नारी-विमर्श  है जो उनके काव्य प्रयोजन एवं सामाजिक सरोकार को स्पष्ट करती है | नारी-विमर्श के नए आयामों को निरूपित करता हुआ दस अंकों में निबद्ध यह उपन्यास मूलतः चिकित्सा विद्यालय की पृष्ठभूमि पर आधारित अपने आप में एक अनूठा उपन्यास है जिसमें बीच बीच में काव्यानंद भी प्राप्त होता रहता है| इस प्रकार के विषय, अनूठी कथावस्तु व काव्यानंद सहित उपन्यास अभी तक शायद ही लिखा गया हो |

        किसी उपन्यास के मूल तत्व-कथावस्तु,पात्र व चरित्र चित्रण,कथोपकथन, देशकाल–वातावरण,शैली एवं भाषा तथा उद्देश्य एवं सन्देश आदि होते हैं |

१.कथावस्तु--- इन्द्रधनुष उपन्यास की मूल विषय-वस्तु नारी-विमर्श है जिसमें सांस्कृतिक गौरव के प्रथम स्तम्भ स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, समानता व समता पर एक नवीन दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए नारी जीवन के विभिन्न आयामों को व्याख्यायित किया गया है एवं उसका मूल भाव-विषय स्त्री-पुरुष मैत्री है जो नायक-नायिका के सात्विक,अशरीरी,प्रीति-मित्रता के बौद्धिक,आध्यात्मिक व आत्मिक प्रेम के रूप को विभिन्न भावों,आयामों,घटनाओं द्वारा प्रस्तुत व व्याख्यायित करती है|इसके साथ ही भारतीय समाज-संस्कृति के गुणात्मक स्वर का पृष्ठ-पोषण,सामाजिक बुराइयों का विरोध एवं मानव आचरण वर्धन पर भी विभिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किये गए हैं|
        प्रेम-प्रणय से इतर भी तो नारी का नारीत्व एवं स्वयं का व्यक्तित्व व कृतित्व है| प्रणय संबंधों से इतर भी तो पुरुष-स्त्री सम्बन्ध हो सकते हैं | इन्हीं भावों पर आधारित नायक-नायिका की मित्रता के साथ साथ घटनाक्रमों, सामाजिक सरोकारों, मानवीय आचरण, भारतीय सांस्कृतिक मूल्य, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, सामाजिक-सांसारिक व्यवहार, मानवीय संबंधों तथा चिकित्सा-विज्ञान व व्यवहार के मानवीय पक्ष आदि को साथ लेकर, मानव जीवन के विविध आयामों पर विभिन्न वार्तालापों, वाद-विवादों द्वारा प्रकाश डालते हुए उपन्यास का कथानक स्त्री-पुरुष प्रेम को नए आयाम देता हुआ लेखक के अभिनव विचारों तथा दृष्टिकोण को पाठकों के सम्मुख रखता हुआ आगे बढ़ता है|    
             स्त्री-पुरुष सम्बन्ध एवं स्त्री स्वतंत्रता के प्रश्न बहुत गहन हैं उपन्यास में लेखक ने कई नवीन एवं मौलिक विचार प्रस्तुत किये हैं |वे एक स्थान पर कहते हैं,’ --अपने कर्तव्यों और मर्यादाओं की सीमा में रहते हुए स्त्री-
एक दूसरे का आदर करें| यदि पुरुषों का एक अलग व्यक्तित्व व संसार है तो नारी का भी एक ‘स्व’ का संसार है |”    उपन्यास का नाम इन्द्रधनुष होने का यही अर्थ भी है जो उपयुक्त ही है |
           नारी शोषण व नारी अशिक्षा जैसे विषय को भी सामाजिक, चिकित्सकीय व वैयक्तिक ढंग से छुआ गया है | नायक का कथन है “नारी शोषण में कुछ नारियां ही तो भूमिका में होती हैं| आखिर हेलन या वैजयंतीमाला को कौन विवश करता है अर्धनग्न नृत्य के लिए ?..चंद पैसे | क्या आगे चलकर कमाई का यह जरिया वैश्यावृत्ति का नया अवतार नहीं बन सकता ?” 
            डा श्यामगुप्त के अनुसार, मानवता का एसा कौन सा विषय या बिंदु है जिसमें पुरुष व नारी सम्बद्ध नहीं हैं | क्या उन्हें कभी पृथक पृथक देखा, जाना, समझा, कहा व लिखा जा सकता है ? नहीं | अतः इसे स्त्री-विमर्श नहीं अपितु स्त्री-पुरुष विमर्श  कहा जाना चाहिए | यही इस उपन्यास इन्द्रधनुष की भाव भूमि है |

२.पात्र व चरित्र चित्रण ---  चिकित्सा एक ऐसा विषय है जो समाज व व्यक्ति के प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित रहता है क्योंकि यह मानव व समाज के समस्त क्रिया-कलापों का नियंत्रक विषय है | अतः सामाजिक व मानव आचरण सेसम्बंधित उपन्यास हेतु चिकित्सा क्षेत्र के पात्रों का चयन उपयुक्त ही है| इन्द्रधनुष उपन्यास में मूल पात्र नायक-नायिका –डा श्रीकृष्ण गोपाल गर्ग –केजी एवं सुमित्रा कुलकर्णी –सुमि हैं | गौण पात्र केवल एक ही है – रमेश –जिसकी नायिका वाग्दत्ता है |एवं जो उपस्थित न रहते हुए भी सारे उपन्यास में उपस्थित है तथा नायक-नायिका के चरित्र की धीरोद्दात्तता का मूल बनता है एवं सामान्य पात्र मूलतः चिकित्सा विद्यालय के गुरुजन अथवा सहपाठी व नायक के मित्र आदि | डा सरला भारद्वाज एवं रमेश दो एसे पात्र हैं जो उपस्थित न होते हुए भी उपस्थिति का आभास कराते हैं|  
      डा श्यामगुप्त के इन्द्रधनुष उपन्यास में नायक-नायिका के चारों गुणों का सटीक चित्रण हुआ हैं | प्रथम मुलाक़ात में ही उपन्यासकार स्पष्ट कर देता है उसके मुख्य पात्र जीवंत एवं धीरोदात्त गुणों वाले नायक-नायिका हैं यह उपन्यास न नायक प्रधान है न नायिका प्रधान, वस्तुतः दोनों ही धीरोद्दात हैं अतः यह विशिष्ट उपन्यास नायक-नायिका प्रधान है | प्रथम पृष्ठ पर ही नायिका का चित्रण इस प्रकार है –“ वही खिलखिलाती हुई उन्मुक्त हंसी |”  वहीं नायक कहता है –      “ आसमां की तो नहीं चाहत है मुझको,
        मैं चला हूँ बस जमीं के गीत गाने |...
     धीर-ललित नायिका-नायक का एक चित्रण देखें—“आई एम् इम्प्रेस्ड, मैं तो केजी की फेन हूँ,बधाई | अब कोई कविता सुना ही दो,‘वह गालों को हथेली पर रखकर,कोहनी मेज पर टिकाकर श्रोता वाले अंदाज़ में बैठ गयी ..|” ..तथा...
        उपन्यास में चरित्र चित्रण ही बिंब व प्रतीक के रूप हैं | इन्द्रधनुष में सभी प्रकार से नायक नायिका के चरित्र-चित्रण का रूप प्रस्तुत किया गया है | विश्लेष्णात्मक चरित्र चित्रण का उदाहरण प्रस्तुत है--
    “नृत्यांगना व नृत्य दोनों ही सुपर्व हों तो संगीत फूट ही पड़ता है गूंगे मन में भी |”
               इसी प्रकार मनोविश्लेष्णात्मक भाव में चरित्र चित्रण प्रस्तुत है --
   ‘”चकरा गये न ज्ञानी-ध्यानी,वह खिलखिलाकर हंसी फिर भाग खड़ीं हुई |”   
अभिनयात्मक या नाटकीय रूप में चरित्र चित्रण इस प्रकार वर्णित किया गया है --
       ओह !वह सीने पर हाथ रखकर निश्वास छोड़ती हुई बोली,’ठीक है मेरा तो नाम ही सुमित्रा है ,
           अन्य विभिन्न पात्रों द्वारा नायक नायिका के एवं स्वयं अन्य पात्रों के चरित्र चित्रण भी बढे सजीव ढंग से किये गए हैं....
      “जी चाहता है तुमसे शादी करलूं | पर सोचती हूँ लोग क्या कहेंगे |” वार्ड से बाहर आते हुए लम्बी-चौड़ी मोटी नसरीन मुझे घूरते हुए चहकी |”
         इस प्रकार चरित्र चित्रण व पात्र चयन की दृष्टि से इन्द्रधनुष सफल एक उपन्यास है |
३. कथोपकथन - इन्द्रधनुष उपन्यास में संवाद पात्रों के मानसिक स्तर एवं देशकाल के अनुरूप हैं |संवाद छोटे-छोटे व सन्क्षिप्त और सशक्त हैं जो तार्किक, सम्भाषण, गवेषणात्मक या वर्णनात्मक, विषय के अनुसार लम्बे –लम्बे भी हैं | परन्तु रोचकता बनी रहती है | संवादों के बीच-बीच में काव्यात्मक लालित्य भी रोचकता व गत्यात्मकता बनाये रखने में सफल हैं | यथा –
और सूद, मैंने कहा |
सूद,वह आश्चर्य से देखने लगी |
वणिक पुत्र हूँ न |
क्या सूद चाहिए,वह सोचती हुई बोली |
हुम sss....,चलो दोस्ती करलें |”-------पृष्ठ १३.
      लंबे लम्बे संवादों का उदाहरण देखिये ---
नहीं अधिक लोगों के मुंह लगना ठीक नहीं है | सब तुम्हारे जैसे सुलझे हुए थोड़े ही होते हैं | कौन सी शास्त्रीय प्रतियोगिता है, जो गाओगे चलेगा |” वह सिर हिलाकर मुस्कुराई |”
                  काव्यानंद सहित संवाद कितना लालित्यपूर्ण व आनंदमय है---
    सुमि कहने लगी –“ जब चाहूँ मन में चले आना, मन मंदिर को महका जाना |
                            यादें तेरी मन में मितवा, बन करके सदा मधुमास रहे |”


    अच्छा, सुनो -    तू पास रहे या दूर रहे, यह अनुरागी मन यही कहे |
                           तेरे जीवन की बगिया में, जीवन भर प्रिय मधुमास रहे |”    

४.देशकाल व वातावरण --- इन्द्रधनुष उपन्यास में डा श्यामगुप्त ने देशकाल व वातावरण का निर्माण अर्थात विविध घटनाओं के घटित होने की परिस्थिति,स्थान व समय का चित्रण  भौगोलिक विवरण, सामाजिक रीति-नीति, कथोपकथन व भाषा सभी के प्रयोग द्वारा किया है जो पात्रों एवं घटनाओं का कथानक से तादाम्य स्थापित करते हैं और उसे प्रामाणिक स्थापित करने में सहायक सिद्ध होते हुए कथावस्तु को गति देते हैं|  यथा ----
  “हूँ बड़ा सुन्दर एडवांस देश है अमेरिका, खुले लोग, खुले विचार, कैसा लगा |’
   ‘हाँ, खुली खुली सड़कें, मीलों दूर तक फ़ैली हुई साफ़-सुथरी बड़ी बड़ी इमारतें, शानदार केम्पस, चमचमाती हुई गाड़ियां, स्वर्ग का सा असीम सौन्दर्य ...”

           ओके बॉस, राकेश सेल्यूट ठोक कर चलने लगा, फिर लौटकर बोला, ‘शाम को पिक्चर चलें, ब्लो हॉट ब्लो कोल्ड इम्पीरियल में |’

          “लगभग दो वर्ष बाद बर्षा की हल्की हल्की बौछारों के साथ मंद मंद सुखद पुरवाई , शीतल मंद समीर के रूप में बह रही थी | इसे सुहाने मौसम में मैं वर्षा के एक नए विरह गीत की प्रथम पंक्ति “ तुम दूर से ही मुस्काते हो “ को लिखाकर गुनगुना रहा था कि अचानक कालबेल बज उठी |

५.शैली एवं भाषा --- शेरो-शायरी के साथ काव्यानंद इन्द्रधनुष उपन्यास की एक नवीन विशिष्ट शैली है |मूलतः उपन्यास अतीत परिक्रमा शैली (फ्लेश बैक )में,संवाद शैली में लिखा गया है |सामजिक,सामयिक,तकनीकी,दैनिक चर्या,भौगोलिक,एतिहासिक,पौराणिक, दार्शनिक एवं तार्किक व्याख्यात्मक विषयों से संपन्न होने के कारण इन्द्रधनुष उपन्यास में डा श्यामगुप्त ने वर्णानात्मक,  व्याख्यात्म, निष्कर्षात्मक, समास शैली एवं व्यास शैली  आदि सभी प्रकार की शैलियों का उपयोग किया है |
      उपन्यास की भाषा मूलतः शुद्ध, सरस, सरल, सहज बोलचाल की खड़ीबोली है, वातावरण के अनुरूप अंग्रेज़ी के शब्दों का भी व्यापक प्रयोग है | विषय व देशकालानुसार उर्दू, देशज व सन्स्कृत के शब्द भी चयन किये गए हैं | एक उदाहरण प्रस्तुत है –              
        “मैंने सोचा उसकी अनुपस्थिति में उसके आस-पास से,नज़दीकी व्यक्तित्वों, मित्रों आदि से कुछ तो उसकी यादों की महक मिलेगी,उसकी उपस्थिति का अहसास होगा | रमेश ने कहा |”

 “ क्या बात है, किसी से लड़कर आरही हो क्या ?
      नहीं भई! सुमित्रा बोली |
            अंग्रेज़ी से परिपूर्ण भाषा का एक उदाहरण है ---
“ बट आई हेव सीन इन यूनीवर्सिटी लिस्ट,सावित्री ने कहा |
 ‘बट आई डोन्ट हेव दैट प्रिविलेज,मैंने कहा |”
       स्त्री चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति.....रक्ष्यते सख्यते पतनात इति पति...जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी...  आदि संस्कृत के वाक्यों व उद्दरणों की प्रस्तुति के उदाहरण हैं | आसमां की चाहत, आपने चिलमन ज़रा सरका दिया, फिजाओं में, मुनासिब नहीं ...आदि उर्दू के शब्द खूब प्रयोग हुए हैं |
      लरिकाई कौ प्रेम कहौ अलि कैसें छूटै तथा पदों व ललित काव्यांशों में ब्रजभाषा का प्रयोग भी हुआ है | देशज शब्दों के प्रयोग की एक अन्य बानगी देखिये ...
      “तेरे से कौन टक्कर ले रे त्रिभंगी “
              व्हाट ! ये कौन सी भाषा है |
      दैया रे दैया, अपनी ही बोली-बानी भुलाय दई रे नटवर ! नगर में आयकें...”




६.उद्देश्य एवं सन्देश -- केवल मनोरंजन या कल्पनालोक का निर्माण करना ही उपन्यासकार का दायित्व नहीं है|उसका दायित्व सत्य का अन्वेषण करना,मूल्य निर्माण और दिशा निर्देशन का भी है| इन पात्रों का वास्तविक होना या काल्पनिक होते हुए भी वास्तविक जैसा प्रस्तुत होना सफल उपन्यास व उपन्यासकार का उद्देश्य होता है |
        इन्द्रधनुष उपन्यास में डा श्यामगुप्त का मूल उद्देश्य स्त्री-पुरुष संबंधों एवं उनकी मित्रता को नवीन आयाम देना तथा प्रेम जैसे उदात्त भाव को संकीर्णता के दायरे से बाहर लाने का प्रयत्न है जिसके हेतु उन्होंने स्त्री-पुरुष मैत्री की एक नूतन दृष्टि का सृजन किया है |
       नायिका का प्रारम्भ से ही वाग्दत्ता होना परन्तु दोनों का मित्र बने रहना , बोम्बे- मुलाक़ात,एयरपोर्ट प्रकरण,नृत्य का घटनाक्रम आदि विभिन्न तथ्य इसी दृष्टि एवं नूतनता की परिपुष्टि हैं| प्रेम पर लेखक अपना विशिष्ट मत स्थापित करते हुए कहता है ----
           “..प्रेम को भौतिक रूप में पा लेना या प्रेम-विवाह कोई इतना महत्वपूर्ण व आवश्यक भी नहीं है कि उसके लिए संसार में सब कुछ त्यागा जाय |
          स्त्री स्वतंत्रता के प्रश्न पर भी उपन्यास में लेखक ने कई नवीन स्थापनाएं एवं मौलिक विचार प्रस्तुत किये हैं एक स्थान पर नायिका स्त्री स्वतंत्रता की बात करती है,”
       क्या पुरुष से स्वतंत्रता या अपने सहज कार्यों से,नहीं न , स्त्री स्वतंत्रता सिर्फ पुरुषों के साथ कार्य करना,पुरुषों की नक़ल करना,पुरुषों की भांति पेंट शर्ट पहन लेना भर नहीं है | एक व्यक्तित्व को दूसरे व्यक्तित्व को सहज रूप से आदर व समानता देनी चाहिए |” 
     “ क्या कभी पुरुष पायल, बिछुआ, कंकण, या ब्रा पहनते हैं, सिन्दूर लगाते हैं ? तो क्यों हम पुरुषों की नक़ल करें |”
    इसी प्रकार नारी द्वारा नौकरी आदि विभिन्न प्रकरणों में स्त्री-शिक्षा, शोषण, यौन उत्प्रीणन आदि पर पर्याप्त दिशा निर्देश एवं नवीन संदेश दिए गए हैं|
        इस सबके मध्य साहित्य के मूल उद्देश्य को अंगीकार करते हुए इन्द्रधनुष  उपन्यास का मूल ध्येय मानव आचरण एवं सदाचार स्थापना द्वारा सामाजिक सरोकारों पर नवीन दृष्टि प्रदान करना है |
     जीवन दर्शन व समष्टि भावयुत मानव आचरण की श्रेष्ठतम वैचारिक अनुभूति की नवीन स्थापना व सन्देश देते हुए डा श्यामगुप्त का कथन है...”व्यक्ति अकेला कुछ नही होता| हम इसीलिये हम हैं कि अन्य हमें वह मानते है | ईश्वर तभी ईश्वर है जब भक्त उसे मानता-पूजता है | हाँ उसे स्वयं को उस स्तर तक उठाना चाहिए |”
       इस प्रकार इन्द्रधनुष उपन्यास में डा श्यामगुप्त अपने उद्देश्य एवं सार्थक सन्देश देने में पूर्ण रूप से सफल सिद्ध हुए हैं और एक जटिल विषय पर अपनी विशिष्ट शैली एवं मुद्रा में रचित यह अनूठा उपन्यास प्रत्येक प्रकार से एक सफल उपन्यास कहा जा सकता है |

                                                                    डा रंगनाथ मिश्र सत्य
                                                                                 एम् ए , पी एच डी, डी.लिट्
                                                             संस्थापक अध्यक्ष अ.भा. अगीत परिषद्, लखनऊ





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